Friday, 24 July 2015

नैतिक के सहारे बेवकूफी

कहने को तो बङे है, है भी। कुछ लोग उन्हें दिलेर कहने से भी नहीं चूकते, वो किस हद तक दिलेर है में जानता हूँ , उनका दिलेर होना मुझे नहीं अखरता पर उनके द्वारा दिलेरी में फेंके गये हवाई ख्याल उन्हें कितनी आत्मसंतुष्टि ओर ख्याति दिलाते है इसको लेकर शंकित हूँ ! वे लगभग हमेशा(मैंने देखा है अधिकतर) या तो अपनो को बेवकूफ बनाते है या बेवकूफ समझते है।

बिना जाने बेवकूफ बनाना एक अलग और आसान चीज है। कोई भी इसे निभा देता है।
मगर यह जानते हुए कि मैं बेवकूफ बनाया जा रहा हूँ और जो मुझे कहा जा रहा है, वह सब झूठ है- बेवकूफ बनते जाने का एक अपना मजा है। यह तपस्या है। मैं इस तपस्या का मजा लेने का आदी हो गया हूँ। पर यह महँगा मजा है - मानसिक रूप से भी और इस तरह से भी। इसलिए जिनकी हैसियत नहीं है उन्हें यह मजा नहीं लेना चाहिए। इसमें मजा ही मजा नहीं है - करुणा है, मनुष्य की मजबूरियों पर सहानुभूति है, आदमी की पीड़ा की दारुण व्यथा है। यह सस्ता मजा नहीं है। जो हैसियत नहीं रखते उनके लिए दो रास्ते हैं - चिढ़ जाएँ या शुद्ध बेवकूफ बन जाएँ। शुद्ध बेवकूफ एक दैवी वरदान है, मनुष्य जाति को। दुनिया का आधा सुख खत्म हो जाए, अगर शुद्ध बेवकूफ न हों। मैं शुद्ध नहीं, 'अशुद्ध' बेवकूफ हूँ। और शुद्ध बेवकूफ बनने को हमेशा उत्सुक रहता हूँ।

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