में अपनी सहधर्मिणी मुखातिब था
बातों ही बातों में चर्चा शादी के अच्छेपन, सजक हमसफर पर हो चली।
प्रसंगानुसार मैंने अपनी दुष्ट आदत के मुताबिक कहा - इसमें परेशान होने की क्या बात
है। देश में अच्छी शादियाँ लड़की भगाकर ही हुई हैं । कृष्ण ने रुक्मणी का हरण किया था और अर्जुन ने कृष्ण की बहन सुभद्रा का । इसमें कृष्ण की रजामन्दी थी। भाई अगर कोआपरेट करे तो लड़की भगाने में आसानी होती है।
पर इस लौक के वर्तमान में 24-2 5 साल के लड़के-लड़की को भारत की सरकार बनाने का अधिकार तो मिल चुका है, पर अपने जीवन-साथी बनाने का अधिकार नहीं मिला।
वे नहीं जानती थी कि मैं पुराण उनके मुँह पर मारूँगा । संभलकर बोली, "भगवान कृष्ण की बात अलग है, वे तो भगवान है!" मैंने कहा, "हाँ, अलग तो है । भगवान अगर औरत भगाये तो वह बात भजन में आ जाती है साधारण आदमी ऐसा करे तो यह काम अनैतिक हो जाता है।
उसे मेरा शास्त्रसम्मत उदाहरण देकर समझाना नागवार गुजरा उसने 'मेरा मनुष्य जाती का होने' पर भी जताया ओर वे कहने लगी, "आप हमेशा उल्टी बातें करते हैं-रीति, निति, परम्परा,विश्वास क्या कुछ नहीं है ?
विश्वास और परम्परा के टूटने में बड़ा दर्द होता है उसमें भी झूठे विश्वास का भी बड़ा बल होता है। उसके टूटने का भी सुख नहीं , दुःख होता है।
जय हो देवी........
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