Sunday, 17 May 2015

दुविधा का द्वंद्व

कभी कभी मन करता है स्त्रियों पर कुछ लिखूँ इस पर कुछ लिखा तो कुछ मित्र मुझे फेमिनिस्ट समझ लेते हैँ।
फिर प्यार पर लिखता हूँ तो मित्र महिला मित्र के बारे मेँ पूछते हैँ।
पालिटिक्स पे लिखता हूँ तो सेकुलर भौँकने लगते हैँ
समकालीन गतिविधियोँ पे एक दिन व्यँग कस दिया तो कलमघसिटू दल पीछे पड गया ।
अब प्रश्न यह है कि क्या लिखूँ
किस पर लिखूँ?'

No comments:

Post a Comment