आत्मनिर्भरता:-
संसार में आत्मनिर्भरता से बढकर कोई गुण नहीं है। हम इस सम्मान की रक्षा तब तक नहीं कर सकते ,जब तक हम स्वयं आत्मनिर्भर नहीं बन जाते। यदि हम इतना निश्चय करलें यदि जीना है तो आत्मनिर्भर होकर ,न कि दूसरे व्यक्ति की दया पर ,तो निश्चय ही हमारे अंदर असीम शक्तियां उजागर हो सकती है।
में अपने परिवेश में देख, महसूस कर रहा हूँ कि व्यक्ति की आत्मनिर्भरता अन्य शील गुणों को केन्द्रित करती है,उपलब्धियों के द्वार खोलती है साथ ही महत्वाकांक्षी भी बनाती है, आवश्यकता है केवल अपने मन को आत्मनिर्भर बनाने की।
आत्मनिर्भर व्यक्ति मुसीबतों एवं बाधाओं को देखकर पीछे नहीं हटता,अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अकेला ध्रुव के समान अटल रहता है क्योंकि उसे अपनी अंतर्निहित शक्तियों,कुशलता,कर्मशक्ति पर पूर्ण विश्वास है।
तो चलिए अपनी सहायता खुद करें, अपनी प्रगति स्वयं तय करें, अपना सामर्थ्य खुद तय करें।मेरा मानना है ऐसा करके हम स्वयं को उस सर्वोच्च शिखर पर विराजमान कर सकते है जहाँ हम खुद को गौरवान्वित महसूस कर सकेंगे।आत्मनिर्भरता ही मानव मूल्यों की सशक्तता है, में आशीर्वाद चाहूँगा मेरी श्रधैय माँ वागिशवरी से कि मुझे भी ऐसे दिव्य गुणों से आलोकित करें।
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