Wednesday, 27 May 2015

निंदा रस


सुना है लुगाई जात को दूसरों की निंदा करने या सुनने में परम सुख की अनुभूति होती है, में इसे बेतुका जुमला मानता था, पर समय के साथ ये धारणा सत्य लगने लगी है इसमें तो कोई दोहराय नहीं कि पुरुषों के बनिस्पत स्त्रियों में निंदा रस का शोक ज्यादा होता है।
एक स्त्री किसी सहेली के पति की निंदा अपने पति से कर रही है. वह बड़ा उचक्का, दगाबाज आदमी है, बेईमानी से पैसा कमाता है, कहती है कि मैं उस सहेली की जगह होती तो ऐसे पति को त्याग देती। तब उसका पति उसके सामने यह रहस्य खोलता है कि वह स्वयं बेईमानी से इतना पैसा कमाता है, सुनकर स्त्री स्तब्ध रह जाती हैक्या उसने पति को त्याग दिया? जी हां, वह दूसरे कमरे में चली गई।

कभी-कभी ऐसा भी होता है कि हममें जो करने की क्षमता नहीं है, वह यदि कोई करता है तो हमारे पिलपिले अहंकार को धक्का लगता है, हममें हीनता और ग्लानी आती है, तब हम उसकी निंदा करके उससे अपने को अच्छा समझकर तुष्ट होते हैं।
सुबह जब उसके साथ बैठा था तब मैं स्वयं निंदा के काला सागर में डूबा उतरा था, कलोल कर रहा था, बड़ा रस है न निंदा में। सूरदास ने इसलिए इसे निंदा सबद रसाल कहा है।
अब कुछ तटस्थ महसूस कर रहा हूँ।

अब आप तर्कों के जाल में मुझे उलझाने की कोशिश करोगे ओर कहोगे "भारतीय दर्शन में पूज्य नारी चरित्र की दुर्दशा कर रहे हो"।
यह कोई अचरज की बात नहीं है । हमारे यहाँ जिसकी भी पूजा की जाती है उसकी दुर्दशा कर डालते है। यही सच्ची पूजा है । नारी को भी हमने पूज्य माना है और उसकी जैसी दुर्दशा की सो तुम जानते ही हो।"

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