Monday, 18 May 2015

वक्त की मजबूरी

"टाइम पास कर रहा हूँ, टाइम पास हो रहा है" जहाँ-तहाँ कहा सुना जा सकता है। पर में कोशिश कर रहा हूँ कुछ ऐसा ही करने की, पर लगता है शायद ही सफल हो पाऊँ ।
वक्त(टाइम) का तो क्या? वो तो पास होता ही होता है चाहे हम ढांन लें की इसे फेल करके ही चेन की नींद सोना है फिर भी। कितनी अजीब सी बात है चॉद ओर मंगल पर शेर-सपाटा वाला ये इंसान वक्त के सामने बोना नजर आ रहा है, इन दिनों में गुजर रहा हूँ कुछ ऐसे ही हालात से पर करु तो क्या करु मजबूरी है ये मेरी।
ओर यही मजबूरी इंसान को वक्त जाया(टाइम पास) करने को मजबूर करती है मजे की बात तो ये है कि मजबूर व्यक्ति मजबूरी में अपना ज्ञान,विवेक,शील सब कुछ खो देता है या खोने को तैयार हो जाता है। सुना है "मजबूरी का नाम महात्मा गांधी होता हैं" पर मुझे भी शंका है गांधी जी भी देश को गुलामी की बेङियों से मुक्त कराने को इतने मजबूर नहीं होंगे जितना इन दिनों में!
इधर-उधर पूछा,कुछ मित्रों को फोन घुमाया, पता लगाने की कोशिश की पर कोई नहीं बता पाया कि मुझसे टाइम पास क्यों नहीं हो रहा।
कुछ चहेतों ने जानना चाहा कि,ऐसी क्या आन पङी तुझ पर जो तू इस कीमती मोती को यूँ लुटाने की सोच रहा है, उन्हें शंका थी कि में किसी दुविधा में हूँ , मेरा एक अजीज गुच्छा होकर मुझे लताङ रहा था तभी मुझे उसमें अपनेपन का भाव नजर आया क्योंकि
जिन्हें ग़ुस्सा आता है वो लोग सच्चे होते हैं
मैंने झूठों को अक्सर मुस्कुराते हुए देखा है...

फिर सोचा अभी तो में तुच्छ आदमी हूँ ,ये मेरी अयोग्यता का प्रतीक है,वैसे भी जिसने कलम घसीटने के अलावा कुछ किया ही न हो उसमें ऐसा काम करने की खूबी भला कैसे आ सकती है?

काफी कुछ सोचा जाने के बाद ध्यान आया कि कौन है भला जो इसे जीतने की चेष्टा करता हो, इसे काटने की कूव्वत रखता हो यदि जाने अनजाने किसी में ऐसी सिद्धि करने ठानी होगी तो निश्चय ही वह गर्त की ओर गया है। वक्त को सलाम है! जिस किसी ने इसका दामन थामा है वह सर्वदा उन्नति के शिखर पर गया है।

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