Saturday, 23 May 2015

देव्य आशीष

सिद्ध श्री भभूताजी के नव निर्मित देवालय में देवाशीष,आशीर्वाद के लिये में श्रद्धानवत हूँ।
नानाजी द्वारा इस प्रतिष्ठित अवसर पर मूर्ति स्थापित करने व प्रथम पूजा का लाभ लेने के साथ ही फलदायी बोली का लाभ उठाने पर शुभाशीष। दान-पुण्य के अवसर की सही पहचान कर सुखद समय पर दान करने पर में नानाजी के प्रति स्नेहलित हूँ।
शुद्ध अंत:करण से देवालय को दिया दान अनंत सुखदायी और फलदायी होता है
दान से बढ़कर श्रेष्ठ कोई कार्य नहीं। धन प्राप्ति के लिए मनुष्य प्राणों का मोह त्याग दुष्कर कठिन कार्य करता है। अपनी मान-मर्यादा भुलाकर धन कमाता है। कष्ट से कमाए धन का ही दान संसार में सर्वश्रेष्ठ है।
ऐश्वर्य का सुखद अनुभव समय के साथ शुभ कर्मों के फलों का भोगी बनने से होता है ना की भोगवादी होने से।श्रद्धा, भक्ति, ज्ञान,अलोभ, क्षमा और सत्य की तरह ही शास्त्रों में दान-पुण्य को उच्च स्थान दिया है । दान मोह विरक्ति की अगली कङी है।

मंदिर में भक्तों व उपासकों द्वारा अर्चन करना, प्रणाम करना, मन वचन से आशीष मांगने का फल देवालय में मूर्ति स्थापक को भी होता है, ऐसा मौका सुलभ होना ओर उसका भागी बनाना देवय शक्ति के आशीष के बिना असंभव है।ऐसे पुण्य का फल सभी परिवारजनों को मिलता है कहीं न कहीं में भी इस फल का भोक्ता हूँ । में नतमस्तक हूँ उस अलौकित शक्ति के प्रति जिसने ऐसा होना संभव किया।

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